बरसात और प्रिय की याद दिलाती कविता // बारिश और तुम

बारिश की ये सतरंगी बूँदें 
याद तुम्हारी ही लाती है 
छम छम कर यूँ बरसे बदरा 
आज बरखा भी इठलाती है 

देखो मौसम की पुरवाई 
याद तुम्हारी लेकर आई 
झरोखे से झाँकती अखियाँ 
भीग नाचती सारी सखियाँ

फिजा ये लगती सुहानी 
मासूम बूँदों की नादानी 
पोखर में तैरती पनडुब्बी 
महक रही हवा में जूही 

टिप टिप की ये बूँदे सारी 
होले से पुकारती न्यारी 
धरा ने ओढ़ी चादर नई 
हरित से पादप पुष्प कई

बिखरे तृण, तिनके सारे 
अवनि के आँचल उग आये
पत्तों की सरसराहट होती
कभी पदचाप आहट होती

मौसम हुआ दिलकश सुहाना 
मद्धम हवा का गुनगुनाना 
अब गीत मधुर गुनगुनाये 
बरखा का ये राग सुनाये 

निखर आई धरा दुल्हन सी 
हरित सी सुंदर चुनर ओढ़े 
सूखे शुष्क तरु भी सारे 
रम्य,दिलकश हुये नज़ारे 

जमकर बरसे काले बदरा
रत्नाकर जैसे धरा उतरा
बह चले यूँ पोखर क्यारी 
कागज की वो कश्तियाँ न्यारी 

वसुंधरा का रूप सुहाना 
कोयल सुनाती मधुर तराना 
बरखा रानी का नीर सारा
कभी लगता मीठा खारा

मंद हवा के झोंके आते 
संग है मंद फुहारे लाते 
कभी बदरा गरजते बरसते
कहीं ठहर अठखेली करते 

भोर आई भीगी हुई सी 
रवि पयोद के आँचल छिपा 
आकुल जग करता प्रतीक्षा 
शुष्क धरणी की वो लिप्सा 

नियति यूँ सुंदर रुप सजाये 
नवयौवना केश बिखराये 
क्षण क्षण रुठे मनाये 
स्याह मेघ गहन हो जाये 

कहीं धरा शुष्क नमी सी 
कभी नेह अनुराग सजाये 
छम छम यूँ बरसे बदरा भी 
हर्षित हो अमी बरसाये ।