सनातन, जो आदि है, अनंत है,
काल से परे अस्तित्व जीवंत है।
न किसी ने बनाया,न मिट सकेगा,
शाश्वत सत्य का ये ऐसा ग्रंथ है।
वेदों की ऋचाओं में जो गूंजा,
उपनिषदों का जो ज्ञान बना।
गीता का वो उपदेश पावन सा
हर युग में जो पथ प्रदर्शक सा
वसुधैव कुटुम्बकम् का नारा,
सब जीवों से प्रेम सिखाया।
अहिंसा, दया, पाठ करुणा का
सनातन ने जग को पढ़ाया।
राम का मर्यादा पुरुषोत्तम कहाये
कृष्ण का योगेश्वर स्वरूप बनाये
शिव का तांडव, शक्ति का रूप है
सनातन में बसा हर देव-स्वरूप है
गंगा की पावन धारा में बहता,
हिमालय की चोटी पर चमकता।
तुलसी की चौपाई में बसता,
मीरा के भजन में रमता।
सत्य, चारों वेदों धर्मं में सजता,
जीवन का ये मूल तंत्र बनता
कर्म, निष्ठा, सौहार्द्र सिखलाता
सनातन यही रूप दिखलाता
युग बदले, था समय बदला,
पर सनातन धर्म अटल खड़ा
दीप से दीप प्रकाश पाता
अंधियारे को यूं दूर करता।
सतयुग,त्रेता,द्वापर से चल रहा
ग्रंथों में भी है रचा बसा
सनातन से भारतवर्ष सारा
विश्व गुरु था कहलाया
सनातन है संस्कृति, सारी
सनातन है ज्ञान, प्रवृत्ति न्यारी
जब तक सूरज-चांद रहेगा,
तब तक सनातन धर्म रहेगा।
✍🏻 कविता चौहान, इंदौर
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