माँ की ममता को प्रदर्शित करती एक कविता // माँ की ममता  
पानी  था  वो भीषण गहरा 
ममता   तो उससे गहरी थी
नज़रें मिला मौत सामने थी
एक माँ यूं जिद पे अड़ी थी  

लाल रक्षा  कवच में यूं  छुपा 
सीने  से चिपका चलती रही
काल  ने  विकराल रूप धरा
बरबस सांझ बन ढलती रही

माथे की  चोट थी कह रही 
प्रचंड लहरों से  हुई लड़ाई
पर  बाँहों  का    घेरा देखो  
एक पल को ना थी छुड़ाई

लाल   को  वो सीने से लगा
जैसे  हो    लोरी  सुना  रही
बंद सी आंखों से भी वो तो
जान  बचा  पहरा।  दे  रही

लहरें  कुछ    उससे  टकराई
उसकी ममता को ना डिगाई
हाथ  इक  पल   को ना छूटे 
भले  साँसों  की लड़ियाँ टूटे

आखिरी   बार भी माँ ने ही 
निर्मम काल  को मात दे दी 
खुद   डूबकर  भी  बेटे को 
ममता   की   सौगात दे दी
  
प्रचंड  लहरों   भी  देख रही
माँ  ने लहरों  को पार किया 
खुद ही  एक कफ़न ओढ़के 
जीवन था अपना वार दिया 

नमन     माँ   तेरे   बलिदान को
तेरी    ममता, तेरे   अरमान को 
तेरे   आखिरी     आलिंगन  को 
उस अंतिम अमिट से बंधन को 

तन     दोनों  भले  डूब गये  
माँ की ममता अमर हो गई  
ममता तो कभी मरती नहीं  
स्वरूप बदल है दिखलाई

दुनियाँ  तो  देखती रह गई 
माँ   ने   सहारा  नहीं ढूंढा  
माँ खुद एक सेतु  बन गई
हृदय  का साहस ना टूटा

माँ सा रक्षक कोई न होता
माँ है  ईश्वर  का रूप दूजा
जीवनदायिनी, ममतामयी 
हरपल  हे   माँ तेरी पूजा।