युद्ध की त्रासदी पर एक कविता// युद्ध की विभीषिका
युद्ध एक खेल रक्त,अग्नि का
बिछा देता ढेर लाशों का
रक्त से रंग निश्छल धरती
बेबस वसुंधरा आहें भरती
अस्त्रों के यूं टकराने से
खो गई मासूम किलकारी
धू धू कर जल उठी मानवता
हाय!कैसी अजब लाचारी?
युद्ध न जाने क्षुधा,पिपासा
कातर नयन किसकी आशा?
अन्न,जल को यूं मनुज तरसे
घनघोर पयोद फिर न बरसे
सजे थे जो सुंदर शामियाने
मिटकर वे तो शमशान बने
जननी की थी गोद उजाड़े
कितने मनुज अवसान बने
आओ धरा का उद्धार करें
धरा पर मनुज सा व्यवहार करें
प्रेम, करुणा के अस्त्र चलायें
युद्ध विभीषिका नाम मिटायें।
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