मंडप सजा , शहनाई बजी
बाबा की पगड़ी खाली पड़ी
हल्दी लगी है, मेहंदी रची
नज़रें ये बाबा को ढूंढती
"कन्यादान अब कौन करेगा?"
प्रश्न ये दुनिया दोहराती
निगाहें सबकी झुक जाती
सांसे कुछ रुकती जाती
कौन हाथ पीले करेगा
कौन डोली तक छोड़ेगा?
किसके कांधे ये सिर रखके
मैं बचपन सा फिर रोऊँगी?
विदा कर कहते बाबा यूँ
आज "मेरी बेटी लक्ष्मी है"
बाबा की तस्वीर के आगे
दिया जल रहा बेबसी से
माँ ने आँचल से मुँह पोंछा
हाथ मेरा यूँ थाम लिया
कन्यादान करुंगी तेरा
मैं ही माँ या बाबा तेरा
लगा जैसे उस पल को यूँ
बाबा की थी खुशबू आई
तस्वीर से मुस्काते बाबा ने
हामी भर दी थी शहनाई
बाबा शरीर से गये सही
आशीष बनकर रहते यहीं
हर बेटी की संग डोली के
गहरा साया होता वही
दुल्हन बनी जो मेरी गुड़िया
आंचल में तारे सजा लेना
कन्यादान के संग तू अपने
बाबा की दुआयें ले जाना
डोली उठेगी घर से तेरी
देख बाबा को तू मुस्काना
बाबा है तेरे संग सदा
नयनों से न आंसू बहाना
विदाई तेरी अधूरी नहीं
आशीष साथ होगा सदा
बाबा की नजर तुझे देखती
अपनी दुनिया में कदम बढ़ा।
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