वैशाख शुक्ल एकादशी आई
मोहिनी एकादशी कहाई
समुद्र मंथन जब पूर्ण हुआ
अमृत कलश की बारी आई
देव-दानव में युद्ध छिड़ा
अमृत पर सबका हक भारी
तब नारायण ने रूप धरा
मोहिनी बन इक सुंदर-न्यारी
सोलह श्रृंगार मोहिनी आई
रूप देख दैत्य दृष्टि ललचाई
दानव सब मोहित हो बैठे
सुध-बुध थी सबकी बिसराई
हाथों ले अमृत कलश सारा
न्याय का था पाठ पढ़ाया
देवों को अमृत पान कराया
सत्य,धर्म को जीवंत बनाया
व्रत करते जो नर नारी
मोह-माया से मुक्ति पाते
नारायण कृपा से जीवन में
सुख-समृद्धि वैभव पाते
अन्न-जल को त्याग करके
हरि नाम का सब जाप करें
भूख-प्यास, व्रत तपस्या से
मनुज के पापों का नाश करें।
मोहिनी व्रत ये सिखलाता
छल से मनुज कुछ ना पाता
माया छल की राह पर चलके
जीवन अमृत भी खो जाता।
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