हिरण्यकशिपु अत्याचार बढ़ा
धरती पर हाहाकार मचा
भक्त प्रह्लाद को दीन्हीं पीड़ा
तब बैकुंठ था दहक उठा
हिरण्यकशिपु ने वर था मांगा
न दिन में मरूं, न ही रात में
न नर से मरूं, न मवेशी से
न सदन में मरूं, न द्वारे पे
आओ प्रभु अब ना देर करो
धर्म की रक्षा अवतार धरो
खंभ फाड़कर यूं आ जाओ
अधर्म का अब तुम नाश करो
संध्या की वो बेला आई
सर्वनाश दैत्य का संग लाई
न दिवस था न ही वो रात थी
न गृह में न आंगन बात थी
तभी खंभा वेग से चटका
गर्जना तीनों लोक हिले
मानव धड़,विशाल सिंह मुख लिये
नरसिंह रूप में थे हरि मिले
न अस्त्र था न शस्त्र लिये
नख ही शस्त्र तलवार बने
जंघा पर लिटाकर दैत्य को
पल में उस पापी प्राण हरे
क्रोध में नयन लाल रक्तिम से
परम भक्त देख शांत हुये
प्रह्लाद को तब गोद उठाके
वात्सल्य से द्रवित कांत हुये
प्रेम, वात्सल्य वरदान दिया
शीश हस्त धर दुलार किया
कोई भय ना सतायेगा
प्रहलाद का भय दूर हुआ
भूल गया था वो अभिमानी,
हरि की माया अपरंपार है।
भक्त की रक्षा को भगवान,
हर बंधन तोड़ने तैयार हैं।
जंघा पर लिटाकर पापी को,
नखों से उदर विदार दिया।
न अस्त्र चला न शस्त्र उठा,
वरदान को सत्य कर दिया।
हरि ने था नृसिंह रूप धरा
नृसिंह जयंती थी कहाई
रूप हरि का ये भक्त को
भय, शत्रुओं से मुक्ति दिलाता
सब हरि हरि नाम पुकारे
गूंज उठे नृसिंह जयकारे
हरि का नव्य स्वरूप सजायें
आज नृसिंह जयंती मनाये।
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