एक हॉरर कहानी //किराये का कमरा 

मेरा नाम निधि है। कॉलेज के लिए जबलपुर आई तो बजट कम था। OLX पर एक कमरा दिखा - "सिर्फ लड़कियों के लिए, 2000 महीना, अटैच बाथरूम।" सस्ता इतना कि शक हुआ, पर मकान मालकिन शांता आंटी बहुत भली लगीं।  

"बेटा, ये कमरा मेरी बेटी मीनू का था। शादी के बाद मुंबई चली गई। तुम रह लो, बस एक शर्त है... रात को 12 के बाद पलंग के नीचे मत देखना। चूहे बहुत हैं, डर जाओगी।"  

कमरा बड़ा था। पुराना पलंग, लकड़ी की अलमारी, और दीवार पर मीनू की तस्वीर। हँसमुख सी लड़की, पर आँखों में अजीब सा खालीपन।  

पहली रात 11:58 पर मैं किताब पढ़ रही थी। तभी _खर...खर..._ की आवाज आई। पलंग के नीचे से। चूहे ही होंगे। मैंने ध्यान नहीं दिया।  

ठीक 12:00 बजे आवाज बंद। उसकी जगह एक _साँस_ की आवाज आई। जैसे कोई पलंग के नीचे लेटा हो और मेरी तरफ मुँह करके साँस ले रहा हो। ठंडी, लंबी साँस... _ह्ह्ह..._  

मेरा खून जम गया। शांता आंटी की बात याद आई। मैंने चादर सिर तक तान ली। पूरी रात साँस की आवाज आती रही। सुबह 5 बजे बंद हुई।  

*डायरी*  

दूसरे दिन मैंने अलमारी खोली। सबसे ऊपर वाले खाने में एक डायरी मिली - "मीनू, 2016"।  

पहला पन्ना: _"माँ कहती है रात 12 के बाद पलंग के नीचे मत देखना। पर आज मैंने देख लिया। वो वहाँ है। वो रोज रात 12 बजे आती है। कहती है मैं उसकी जगह पर सो रही हूँ।"_  

आखिरी पन्ना, तारीख 14 नवंबर 2016: _"आज वो बाहर आ गई। माँ से कहा तो माँ ने मुझे ही पागलखाने भेज दिया। माँ ने कहा था उससे नजर मत मिलाना। पर आज उसने मेरा नाम लिया... निधि। मेरा नाम तो मीनू है। फिर उसने निधि क्यों कहा?"_  

मेरे हाथ से डायरी गिर गई। मेरा नाम निधि है। मीनू 2016 में पागलखाने गई थी। तो 2016 में ये 'निधि' कौन थी?  

उस रात 11:55 पर मैंने ठान लिया। आज देखूंगी। मोबाइल का कैमरा ऑन किया और 12:00 बजते ही पलंग के नीचे टॉर्च मारी।  

वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ धूल। मैंने राहत की साँस ली। तभी मोबाइल की स्क्रीन पर देखा। कैमरे में दिख रहा था - पलंग के नीचे एक औरत उल्टी लटकी हुई है, छत से चिपकी हुई। सफेद आँखें, और वो सीधा कैमरे में देख रही थी। उसके होंठ हिले: "तूने देख लिया।"  

मैं चीख के पीछे हटी। पलंग के नीचे देखा - खाली। पर कैमरे में वो अब रेंगकर बाहर आ रही थी।  

*मैं ही मीनू हूँ*  

मैं भागकर शांता आंटी के कमरे में गई। गेट खटखटाया। आंटी ने दरवाजा खोला तो मैं सन्न रह गई।  

आंटी की जगह मीनू की तस्वीर वाली लड़की खड़ी थी। जिंदा। पर उसकी आँखें... वो सफेद थीं। वो हँसी, "निधि, तू फिर आ गई? हर 7 साल में तू नया नाम लेकर आती है। पहले सविता, फिर रिया, अब निधि।"  

मेरे पैर जवाब दे गए। "म-मैं निधि हूँ... मैं आज ही आई हूँ..."  
वो और पास आई। "नहीं। तू मीनू है। 2016 में तूने पलंग के नीचे देखा था। तब से तू ही वो है जो रात 12 बजे साँस लेती है। और मैं... मैं असली शांता हूँ। मेरी बेटी मीनू को तूने खा लिया था।"  

तब मुझे याद आया। बचपन की धुंधली याद... पागलखाना... सफेद कमरा... और डॉक्टर का कहना, "मीनू बेटा, तुम निधि नहीं हो। निधि तो वो लड़की थी जो तुम्हारे पलंग के नीचे मिली थी, 2009 में। उसकी लाश 3 दिन पुरानी थी।"  

मैं चिल्लाई। पर आवाज नहीं निकली। क्योंकि आवाज पलंग के नीचे से आ रही थी... _ह्ह्ह्ह्ह..._  

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*एक हफ्ते बाद*  

OLX पर नया एड आया: "सिर्फ लड़कियों के लिए, 2000 महीना, अटैच बाथरूम।"  
एक नई लड़की कमरा देखने आई। नाम - प्रिया।  
शांता आंटी ने हँसकर कहा, "बेटा, बस एक शर्त है... रात 12 के बाद पलंग के नीचे मत देखना।"  

कमरे में पलंग के नीचे डायरी पड़ी थी। नया पन्ना जुड़ा था:  
_"प्रिया, स्वागत है। अब तुम मीनू हो। और मैं... मैं निधि थी। रात 12 बजे मिलते हैं।"_  

पलंग के नीचे से किसी के सिसकने की आवाज आई। और फिर ठंडी साँस... _ह्ह्ह्ह्ह..._  

                *समाप्त*  

_कहते हैं कुछ कमरे किराए पर नहीं मिलते... वो अपना किरायेदार खुद चुनते हैं। और एक बार जो पलंग के नीचे देख ले, वो फिर कभी अपना नहीं रहता।_  

आपको यह हॉरर स्टोरी कैसी लगी कमेंट करके अवश्य बताये। अब अगली कहानी में मुलाकात होगी। तब तक के  लिए ढेर सारा प्यार दोस्तों।