बाबा घर से चले जायेंगे
फिर ना यूँ वापस आयेंगे
बेटा कहके ना बुलायेंगे
खिलौने घर नहीं लायेंगे
हो गया ये घर आज सूना
टूटा पड़ा मेरा खिलौना
फिर कभी नहीं दिखलायेंगे
बाबा घर से चले जायेंगे
दीवारों में गूंजती हँसी
सर पर आशीष की छाँव बसी
माँ की आँख में आँसू आते
सदा बाबा की याद दिलाते
बाबा का बिस्तर पड़ा खाली
दवाइयों की वो अलमारी
पुरानी किताबें अधखुली
तंबाकू की इक डिबिया मिली
हँसी ठहाके थम जायेंगे
बाबा ये घर छोड़ जायेंगे
ऊँगली कौन पकड़ पायेगा
बाजार कौन ले जायेगा
बाबा चुप से क्यूँ लेटे है
खुली आँखों में समेटे है
बाबा मुझसे करो ना बातें
किस्से सुनाओ हँसते गाते
बाबा मेरी आवाज़ सुनो
बाबा बाबा कह पुकारती
आँखें वो जो खुली पड़ी है
मुझे अब भी है दुलारती
भीड़ लगी है घर में सारे
खो गये गगन से सितारे
अपनों को रोते बिलखते
छोड़ सब चल दिये अकेले
मेज पर पड़ी कुछ सिलवटें
रात जब बदलते करवटें
मेज खाली रह जायेंगे
बाबा अब कभी ना आयेंगे।
✍ कविता चौहान
स्वरचित एवं मौलिक
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