****** देखो उजियारा******
देखो उधर उजियारा है 
धवल रवि कितना प्यारा है 
रवि ने यूँ बिखराई रश्मियाँ 
चमक उठी बेबस ज़िंदगियाँ 

शुष्क अंखियाँ थी पथराई
दूर रम्य आभा जगमगाई 
विधु ने तब चाँदनी बिछाई
मर्म,शीतल ज्योत्सना आई

करते नयन अनंत प्रतीक्षा
सूक्ष्म आस थी इक परीक्षा 
तिमिर था शशिकर को घेरे
स्याह पयोद कितने घनेरे

स्याह तिमिर कुछ तो सिखलाता 
सूक्ष्म सी इक आस दिखलाता
संग निशा अंधियारी लाये 
नित भोर ले रवि जगमगाये 

हुआ किंचित नया सवेरा
था अंधियार ने पथ घेरा
अंतस कभी इक आस दमकी
सहसा उज्ज्वल चपला चमकी।

✍"कविता चौहान"
       स्वरचित एवं मौलिक