बुझ गये ये दीपक सारे
आकर इसे तुम जलाओ ना
बिखरा पड़ा तिमिर सदन में
इसे अब दूर हटाओ ना
उग आई गमले में नागफनी
सजा दो इसमें मधुकामिनी
किसने था इस क्षण को थामा
बरबस जैसे बिखरी यामा
शैय्या पर पड़ी यूं सलवटें
बंद पड़ी कभी टिक टिक घड़ी
मौन खड़ी बेबस दीवारें
शुष्क नयन अब किसे पुकारे?
सुना रहे विहग तराना
भोर सुहानी देख चले आना
गोधूलि बेला यूं सिमट रही
आस,उम्मीद भी सिहर रही
इक बार इस सदन में आना
फिर कभी ना वापस जाना
दीवारों ने यूं रंगत खोई
सजल नयनो से चंपा रोई
पसरा है यूं आज सन्नाटा
क्यूँ था कोमल हिय बाँटा
दीर्घ सी एकाकिनी तमी
अधरों से कितना दूर अमी
ऋतु भी थी कैसी सुहानी
नाते थे कितने रुहानी
संग वही प्रीत निभाओ ना
आज फिर यूं चले आओ ना।
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