प्रभु जगन्नाथ को समर्पित एक रचना// जय जगन्नाथ
सुंदर सुशोभित रथ विराजे
संग बलभद्र सुभद्रा साजे
नयनों से कृपा बरसाये
रमणीय छबि प्रभु मन भाये
मधुर पावन बेला आई
चल दिये जगन्नाथ निराले
रथ खींचते भक्त चल रहे
जयकार करे हो मतवाले
बलभद्र सुभद्रा संग चल रही
प्रभु दृष्टि से करुणा बह रही
जगन्नाथ है सिंहासन बैठे
अनंत लीला भीतर समेटे
मौसी के घर मिलने जाते
सुभद्रा, बलभद्र संग ले जाते
ठहर जाते नौ दिन गुड़ीचा
पुण्य कमाया जिसने रथ खींचा
नील मेघ से नयन तुम्हारे
लगते है भक्तों को प्यारे
रथ रस्सी डोर मोक्ष मुक्ति की
पुण्य,आनंद, अनंत शक्ति की
तुम ही कृष्णा तुम जगन्नाथ भी
सांवरिया तुम दीनानाथ भी
सुंदर सलोना रूप अनोखा
वंदन करता हवा का झोंका
रथ पर जब निकली सवारी
जयकारा लगाये नर नारी
करुणामई प्रभु की दृष्टि
चला रथ रुक जाती सृष्टि
हुये जगन्नाथ दर्शन तिहारे
मिट गये कष्ट दुख दर्द सारे
आई मैं प्रभु द्वार तुम्हारे
जगन्नाथ है मेरे रखवाले।
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