एक प्यारी सी प्रेम कविता // तमस का दीप

स्याह   तिमिर ये  गहन काला 
सदन में  पसरा  अंधक सारा
शुभ्र   इक  जोत  जला जाना
तमस का दीप बन चले आना

पथ है कुछ दुर्गम कठिन सा
कहीं  है  कंटक  शूल बिखरे
वाटिका   में  थे  प्रसून खिले
कुछ टूटे  कुछ विमुख छितरे

टूटती    सांसों      की  लड़ियाँ 
पहर   गिनगिन   बीती घड़ियाँ 
दिलकश से वो पल दिखलाना
तमस का दीप बन चले आना

भूले    बिसरे     कुछ    तराने
अनजाने    से   मुखड़े   पुराने
नई   इक   दुनिया बसा जाना
तमस का दीप बन चले आना

शुष्क   लब  यूँ भूले मुस्काना
अधरों   पर   ना  कोई तराना 
गीत  मधुर   अब  सुना जाना
तमस का दीप बन चले आना

नयनों   में   कोई     स्वप्न सजा
था   कभी   सुंदर   नगर   बना
एक   पल   दे    गया नज़राना 
तमस  का दीप बन चले आना

कभी  घबराये  ना   हिय मेरा
हुआ  किंचित   यूँ नया सवेरा
विधु   तू    चाँदनी  बिखराना
तमस का दीप बन चले आना।