पावन गंगा नदी पर एक कविता// पावन गंगा 


बेला ये पावन आज गंगा
स्वर्ग से धरा पधारी गंगा 
गंगा दशहरा आज ये गंगा
अवतरण दिवस है आज गंगा

शिव जटाओं से निकली गंगा
विष्णु चरण से बह आई गंगा
ब्रह्मा कमंडल से जन्मी गंगा
मोक्षदायिनी कहाई गंगा

भगीरथ की प्रण साक्षी गंगा
सगर-पुत्रों की तारिणी गंगा
स्वर्ग से धरा उतरी गंगा
पापों की है संहारिणी गंगा

गौमुख से गंगासागर गंगा
बहती है अविरल धारा गंगा
काशी में पूजी जावे गंगा
हरिद्वार में किनारा गंगा

जनजन डुबकी लगाते गंगा
जन्म-जन्म के पाप धोवे गंगा
ऋषि-मुनि तट पर बैठे गंगा
वेदों के स्वर महिमा गंगा

अन्नदाता जीवनरेखा गंगा
खेतों में हरियाली गंगा
प्यासे कंठ की तृप्ति है गंगा
संस्कृति की रखवाली गंगा

पुण्य दायिनी,जग तारिणी गंगा
इक माता कहलाती गंगा
मलिन ना कभी होवे गंगा
सदा ,निर्मल पावन सी गंगा

रहने दो स्वच्छ, पावन गंगा
बहने दो झर झर सी गंगा
विष ना घोलों भीतर गंगा
जीवन बचा लो आज गंगा।