नारी के अपमान पर एक कविता// फिर महाभारत
द्रौपदी फिर सताई गई
खींच सभा में लाई गई
दैत्यों ने उग्र हुंकार किया
अस्मत को उसकी दुत्कार दिया
कभी चीखकर पुकारती
कातर नैनो से निहारती
बेबस हो यूं अश्रु बहाये
मौन देखे कोई ना आये
दैत्यों सा अट्टहास किया
अबला का यूं परिहास किया
निरीह पशु सा उसे सताते
भूलवश ना दया दिखलाते
वही महाभारत दोहराई
दुशासन ने पांचाली सताई
धृतराष्ट्र से नेत्रहीन सारे
कुछ दुष्ट कुछ भय से हारे
बिलखती द्रौपदी पुकारे
आओ मेरे कृष्ण सांवरे
नीचता दिखाने दैत्य आये
मासूम अबला को सताये
शील बचाने कोई न आया
दानवो ने था रूप बनाया
दुष्ट हुये मानवता पर भारी
इक अबला ने अस्मत हारी
रोती बिलखती कहती होगी
हिय की पीड़ा सहती होगी
निर्दयी तुम यूं निष्ठुर बने
मानव से तब दानव हुये
उभर आई द्रौपदी पीड़ा
चीरहरण का तिमिर गहरा
फिर दानवों ने भीड़ लगाई
निश्छल पांचाली खींच लाई
द्रोपदी को निर्वस्त्र किया
अस्मत को कदम से ध्वस्त किया
मानवता फिर घबराई है
माता की कोख लजाई है
जन्म दिया था जिस माता ने
वही माता शरमाई है
श्वेत वस्त्र पर यूं कलंक से
राजा संग भी एक रंक से
कौरव, कंस सब है मिट गये
जिसने नारी अपमान किया
कुछ शेष ना रह जायेगा
धरा से नाम मिट जायेगा।
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