घर आंगन की शोभा न्यारी
पुष्पों की इक फुलवारी
मां बाबा की आंख का तारा
कभी है ये घर संसार सारा
बाबा की होती लाडली
मां की गुड़िया कहलाती
दादा दादी की दुनिया सी
भाई संग वो मुनिया सी
बिटिया जब घर में होती
घर आंगन जगमग होता
कोना कोना गृह सदन का
उज्ज्वल इक नवरंग होता
छोड़ जाती जब घर द्वारा
सुना हो जाता आंगन सारा
चंचल चपल सी एक दामिनी
कभी विभावरी कभी यामिनी
नाज़ुक से है कंधे इनके
जिम्मेवारी फिर भी उठाती
उठा लेती कभी बोझ सारा
स्वरूप इक नया दिखलाती
बेटा कुल दीपक कहलाये
बिटिया होती कुल की ज्योति
सहती डांट फटकार कभी
फिर भी भीतर धीर धरती
बेटे कभी उद्दंड हो जाते
बेटी फिर भी शालीन होती
मां बाबा की मान मर्यादा
सदा उसके हृदय में होती
बेटी तो एक पुष्प वाटिका
सुमन सारे इसमें सजते
बेटी बिन ये जग अधूरा
बेटी से घर परिवार बनते ।
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