कलयुग पर एक शानदार कविता//कलि चरम पर

जब कलि  चरम पर आयेगा 
कुछ   शेष  ना  रह  जायेगा 
एक नया रूप  दिखलायेगा 
विकराल काल छा जायेगा 

नारी  मर्यादा    से      छूटेगी 
लाज  छोड़  ही    सब लूटेगी
भाई   भाई     शत्रु     बनेगा 
शामियाने सा मरघट सजेगा

धर्म दया   सब मिट जायेगे 
छल ,अधर्म, यूं दिखलायेगे 
मनुज  मोह  ही  भुलायेगा
नारी,धन   पर ललचायेगा 

चरित्र  मान  का  पतन होगा 
सत्य धर्म का तब दहन होगा 
श्वान   पीछे    छूट   जायेगे 
मनुज मनुज का मांस खायेंगे 

सत्य बोलना   घातक होगा 
सत्यवादी ही  पातक होगा
मानव    धर्म  भूल  जायेगे 
मनुज  दानव  बन  जायेगे 

जग का   नया रुप सजेगा
लोभ,वासना माल जपेगा
बालमन    तरुण   बनेगा
क्रीड़ा छोड़ कामुक रहेगा

धर्म, मानवता जलमग्न होगी
नारी,  लाज  छोड़ नग्न होगी
नर     प्रेम,  नेह     भुलायेंगे 
वासना   में    चित्त लगायेंगे

रिश्ते  मान  खोते जायेंगे 
देह  लोलुप   बन जायेंगे 
नीर   सा   रक्त  बहायेगे 
करुणा, दया भूल जायेंगे 

निरीह  पशु   ग्रास बनायेंगे 
नर, पशु  का  मांस खायेंगे 
देवालय मलिन कर जायेंगे 
धर्म   पथ  को   भरमायेगेे 

तब भाग मनुज के फूटेंगे 
दुर्वचन   मुख   से  छूटेंगे 
जर्जर घर संसार सजेगा 
नेह,प्रेम   क्षणिक बनेगा 

रुग्ण का  उपहास उड़ायेगे 
गृह सदन में आग लगायेंगे 
माया  धन   सौदागर  होंगे 
रक्त   के  बहते सागर होंगे 

अधर्म    मार्ग     अपनायेगे 
पाप  पुण्य    सदा भुलायेंगे 
मांस ,मदिरा का भोग करेंगे 
वासना, लिप्सा  लोभ करेंगे

नारकीय  तब जीवन होगा
कीट,कृमि सा यापन होगा
मदिरालय में भ्रमण करेंगे 
देवालय छोड़ गमन करेंगे 

विधाता   को  भूल जायेगे 
मनुज  मनुज  लड़ जायेंगे 
तृष्णा  का  ना  अंत होगा 
लोभ  लालच अनंत होगा 

नेकी   संग   साथ    छोड़ेगी
बुराई    इक   छाप  छोड़ेगी 
जनजन ही आततायी होगा
मानव   तू  धराशायी होगा 

कीट  पतंग  से बन जायेगे 
मानव  धरा से मिट जायेंगे 
मानवता पर आघात होगा
लड़ते जीवन समाप्त होगा 

मानवता      छूट   जायेगी 
स्याह  कलंक लगा जायेगी 
कुछ  शेष   ना  रह जायेगा 
जब कलि चरम पर आयेगा।