***शील बचाओ***
फिर आया रावण सीता हरने
भेष बदल जानकी को छलने
रघुवीर तुम अब जल्दी आओ
कोमल जानकी शील बचाओ
छल कपट था भीत र धरे
खड़ा दशानन षड्यंत्र करे
देहरी को लांघ ना पाये
जानकी पर ना आंख उठाये
सदन बैठी जानकी एकाकिनी
पतिव्रता सुकुमारी जनक नंदिनी
अंतस्थल को एक आस लगाये
हिय भीतर था नेह सजाये
लक्ष्मण रेखा को पार किये
आया दुष्ट दुर्भावना लिये
जब तक थी भीतर खड़ी
मोतियों समान कोमल लड़ी
मर्यादा को लांघ ना जाये
बैठा दशानन दृष्टि लगाये
जानकी थी कोमल भोली
नजरे झुका कुछ ना बोली
पाखंड धर आडंबर करता
दुष्ट दशानन रूप बदलता
आया था कुछ घात लगाये
दी जानकी की राह भरमाये
थी जानकी कुछ सकुचाई
पवन ने थी चुनर उड़ाई
धरणी करती कुछ इशारे
मौन हुये बरबस नजारे
रघुवीर आज फिर आयेंगे
सिया का शील बचायेगे
दुष्ट का तब यूं संहार होगा
अधर्म पर प्रहार होगा
जब कोई अबला को सताये
दुर्गति,विनाश को ही पाये
त्रेता द्वापर की कहानी
दुष्ट ना कर सके मनमानी
रघुवीर अब जल्दी आओ
धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाओ
दशानन का वध कर जाओ
जग संसार को मुक्ति दिलाओ।
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