नदी पर एक कविता हिन्दी में 

 

                               नदी


झर झर बहती पुण्य सलीला 

समेट  खुद में असंख्य लीला 

मोक्ष      देती    मोक्षदायिनी 

गंगा तो एक सतत प्रवाहिनी 


भागीरथ     धरा     लाये   गंगा 

शिव  जटा  से  ही निकली गंगा 

कल कल    बहती  निर्मलधारा 

सदियों   मनुज  जीवन  सँवारा 


गंगा  की   है  महिमा निराली

जीवन   में   करती  उजियारी

अक्षय,अविनाश नीर सी गंगा

अनंत,  प्रकाश,  ज्ञान है गंगा


वेदों   ने   है   गाई  महिमा

गंगा जीवन,उत्थान प्रतिमा

मोक्ष, मुक्ति  का मार्ग गंगा

जाह्नवी,  पावन शांत गंगा


नारायण    के   पग     थे  धोई

तब   गंगा  विष्णु  पदी  कहाई 

खेत,खलिहान की जननी गंगा

मनुज  की  तृषा  मिटाती गंगा


जननी  सी तुम जीवनदायिनी 

गंगा   तुम  हो  पतित  पावनी 

मधुरिम शीतल अमृत समाता

स्वरूप  गंगा  दिव्य कहलाता


सतत् अविरल सी गंगा धारा 

सृष्टि,  जनजीवन  को  तारा

जीवन   गाथा   रचती  गंगा

गीता  सी हृदय बसती गंगा


जन   जन   है रसपान करते

गंगा   नीर   अमृत ही चखते

गंगा   का  है जब स्पर्श पाये

मानव जीवन  धन्य हो जाये


जननी  जैसे स्तनपान कराती 

गंगा  जल से  जीवन दे जाती

पालन, पोषण कर जननी सा

तब   ही   गंगा  मां  कहलाती 


धवल  उज्ज्वल रूप दमकता

दुख,पाप, यूं अज्ञान सिमटता 

स्नान,पुण्य  तब लाभ है पाते

गंगा  मां  की  शरण जो जाते।