एक दर्द भरी कविता// कुछ प्रेम
निशी थी वो बड़ी सुहानी
मौसम की वो बड़ी मनमानी
मिले जब दो दिल दीवाने
गाते गुनगुनाते कुछ तराने
वो गलियां वो चौबारे
तटिनी के थे सुंदर किनारे
घर आंगन की चौखट सारी
हर कदमों संग आहट तेरी
दुनिया थी वो कुछ सतरंगी
यादें ही कितनी रंग बिरंगी
संग तेरे यूं रातें बीती
सीप में बना अनमोल मोती
हर लम्हा बन गया सुनहरा
प्रेम सागर यूं अनंत गहरा
करती निसर्ग सुंदर इशारे
सरिता में बसते शिकारे
सुंदर नैनों ने स्वप्न सजाये
अनगिनत सी आस बनाये
हस्त थामे कोमल करावली
प्रीत थी हाय कितनी बावरी?
हीरक संग पिरोई लड़ियां
दिलकश,मोहक सी वो घड़ियाँ
दीपक संग धवल उज्ज्वल ज्योति
टूटी माला बिखरा मोती
अब ना सजते सुंदर सपने
गुज़रते पग भी लगे थमने
प्रस्तर से बन गये दिल सारे
नयनों में ना अब सितारे
मुरझाया था रूप सलोना
टूटा जैसे कोई खिलौना
सजल नयन से काजल बहाया
निर्मम हवा आंचल बिखराया
प्रेम प्यार की खाई कसमें
भुल आये यूं जग की रस्में
मासूम दिल को समझाया
किसने है प्रेम को पाया ?
सबकी जुदा होती लकीरें
नयनों से ओझल हो तस्वीरें
प्रेम का प्रथम शब्द अधूरा
प्रेम कब,किसका होता पूरा?
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