बाबुल का घर आंगन छोड़के
घर पिया के चली आई थी
नैनों में थे सपने कितने
अंबर में थे तारे कितने
छूटा था बाबुल का अंगना
मैया की वो लोरी छूटी
सखियों की यूं हंसी ठिठोली
भाई बहन की हमजोली
इक एक दिन वह सबसे आला
हुआ सवेरा एक निराला
नवजीवन के देखे सपने
छोड़ चली थी पीछे अपने
पिया अंगना लगता प्यारा
आंचल में लाई नेह सारा
झर झर बहती जीवन धारा
नभ दामन में चमके सितारा
बदल गया था सब कुछ ऐसा
रिश्तो में आया रुपया पैसा
त्याग, बलिदान को ना देखा
लोभ ने यूं किया अनदेखा
रिश्तों का तब मोल लगाया
सब कुछ बाजार बेच आया
लोभ की अग्नि में झुलसे रिश्ते
ना हुई खत्म लालच की किश्तें
था ऐसा एक पैगाम मिला
प्रेम सुमन फिर कभी ना खिला
संग भरकर रुपया लाना
ना ला सको तो फिर ना आना
घबराई सकुचाई बिटिया
ओझल नींद टूटी निंदिया
बाबा को थी बात बताई
मैया बाबा झोली फैलाई
निर्मम हृदय तब ना पिघले
पल भर में थे नाते बदले
कातर नयन झर झर बैठे
बेबस अधर कुछ ना कहते
सजल नयन बोझिल थी सांसें
चल रहे थे दिल को थामे
बहती थी अश्कों की लड़ियां
बिखरी पड़ी बाबा की गुड़िया
प्रेम,प्रीत तब रास आई
प्राण खो के कीमत चुकाई
धू धू कर जल उठी दुनियाँ
मैया बाबा ने खोई बिटिया।
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